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Sunday, January 2, 2011

बीते हुए लमहों की कसक साथ तो होगी

Singer: Mahendra Kapoor

अभी अलविदा मत कहो दोस्तों
न जाने कहाँ फिर मुलाक़ात हो, क्योंकि

बीते हुए लमहों की कसक साथ तो होगी
ख़्वाबों में ही हो चाहे मुलाक़ात तो होगी

ये प्यार में डूबी हुई रंगीन फ़ज़ाएं
ये चहरे ये नज़रें ये जवाँ रुत ये हवाएं
हम जाएं कहीं इनकी महक साथ तो होगी

फूलों की तरह दिल में बसाए हुए रखना
यादों के चिराग़ों को जलाए हुए रखना
लंबा है सफ़र इस में कहीं रात तो होगी

ये साथ गुज़ारे हुए लमहात की दौलत
जज़्बात की दौलत ये ख़यालात की दौलत
कुछ पास न हो पास ये सौगात तो होगी



Sunday, December 19, 2010

ढूँढ़ें तुझको नैन दीवाने आजा आजा रे

Singers: Lata Mangeshkar and Mahendra Kapoor

ढूँढ़ें तुझको नैन दीवाने आजा आजा रे
इन नैनों की प्यास बुझाने आजा आजा रे

ढूँढ़ें तुझको नैन दीवाने आजा आजा रे
इन नैनों की प्यास बुझाने आजा आजा रे

हँसते हँसते आज दीवाने मिलेंगे
तू जब आए फूल हज़ारों खिलेंगे
जाग उठेंगे सब वीराने आजा आजा रे
आजा आजा रे

दिल का है ये हाल तुम्हारी लगन में
जैसे कोई फूल अकेला चमन में
आशाओं के गीत सुनाने आजा आजा रे



Tuesday, December 14, 2010

अंधेरे में जो बैठे हैं

Singer: Mahendra Kapoor

उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम
जिधर भी देखूँ मैं
अंधकार! अंधकार!

अंधेरे में जो बैठे हैं, नज़र उन पर भी कुछ डालो
अरे ओ रोशनी वालों
बुरे इतने नहीं हैं हम, ज़रा देखो हमें भालो
अरे ओ रोशनी वालों

क़फ़न से ढाँक कर बैठे, हैं हम सपनों की लाशों को
जो क़िस्मत ने दिखाए, देखते हैं उन तमाशों को
हमें नफ़रत से मत देखो, ज़रा हम पर रहम खा लो
अरे ओ रोशनी वालों

हमारे भी थे कुछ साथी, हमारे भी थे कुछ सपने
सभी वो राह में छूटे, वो सब रूठे, जो थे अपने
जो रोते हैं कई दिन से, ज़रा उनको भी समझा लो
अरे ओ रोशनी वालों



Sunday, October 24, 2010

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों

Singer: Mahendra Kapoor

चलो इक बार फिर से, अजनबी बन जाएँ हम दोनों
चलो इक बार फिर से, अजनबी बन जाएँ हम दोनों

न मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की
न तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत अन्दाज़ नज़रों से

न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों में
न ज़ाहिर हो तुम्हारी कशमकश का राज़ नज़रों से

तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशक़दमी से
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराए हैं

मेरे हमराह भी रुसवाइयाँ हैं मेरे माज़ी की
तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साए हैं

तारुफ़ रोग हो जाए तो उसको भूलना बेहतर
ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा

वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा